दक्षिणी राजस्थान का यह आदिवासी क्षेत्र देश की आजादी के 62 वर्षों बाद भी विकास की धारा से कटा हुआ है और आज भी यहाँ के ज्यादातर लोग संविधान द्वारा हर नागरिक को दिये गये अधिकारों और सुविधाओं-जैसे भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सिंचाई और रोजगार आदि के लिए तरस रहे हैं। हम मानते हैं कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस बदहाली और पिछड़ेपन का असली कारण यह है कि यहाँ के लोगों को बचपन में ही आगे बढ़ने का पूरा अवसर - खासकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर नहीं मिल पाता है। आज हमारे और सुविधासम्पन्न क्षेत्र के बच्चों को मिल रहे अवसरों के बीच मे भारी अन्तर है। अवसरों के इस अन्तर ने हमारे और सुविधासम्पन्न क्षेत्रों के लोगों के बीच बचपन में ही एक चौड़ी खाई बना दी है, जिसको चाह कर भी पार कर पाना हमारे लिए कभी सम्भव नहीं हो पाता और हम जिन्दगी भर एक मजदूर ही बने रह जाते हैं। अच्छी शिक्षा और अवसरों के न मिलने से यहाँ के बच्चों की बौद्धिक, सामाजिक क्षमताओं का विकास नहीं हो पाता और बड़े होकर वे इतने सक्षम नहीं हो पाते कि इस क्षेत्र के विकास के लिए बनने वाली नीतियों, कार्यक्रम और क्रियान्वयन की प्रक्रिया में भागीदारी कर सकें, जिसके कारण बदहाली और गैरबराबरी की व्यवस्था बनी रहती है। समान बचपन अभियान दक्षिणी राजस्थान के 27 ब्लॉक में अवसरों के इस भारी अन्तर को खत्म करने के लिए आवाज उठा रहा है। इस जन अभियान की यह मांग है कि दक्षिणी राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था में इस भौगोलिक क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार बदलाव किया जाये ताकि इस क्षेत्र के लोगों को भी बचपन से ही पढ़ने और आगे बढ़ने का बराबर मौका मिले। समान बचपन अभियान की यह मांग है कि पूरे दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को 3 से 18 वर्ष तक न्यूनतम शैक्षणिक स्तर के साथ अनिवार्य रूप से समान एवं नियमित शिक्षा के अवसर मिलने चाहिये। इसके लिए पाँच ठोस सुझाव रखे गये हैं कि (1) पाँचवीं कक्षा तक कक्षावार और छठी कक्षा से विषयवार योग्य एवं दक्ष अध्यापक पर्याप्त संख्या में उपलब्ध कराए जाएँ, (2) शिक्षक को शैक्षणिक कार्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों जैसे पोषाहार व्यवस्था, निर्माण कार्य, जनगणना, पशुगणना अथवा पल्स पोलियो में सम्मिलित करना तुरन्त बन्द किया जाए, (3) कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों के शैक्षणिक स्तर का आकलन भी सतत् मूल्यांकन पद्धति से हो और उसी आधार पर उन्हें अगली कक्षा में प्रवेश दिया जाए, (4) सबको समान, नियमित, अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा दिलाने हेतु शिक्षा पर कुल राष्ट्रीय उत्पादन का कम-से-कम 6 प्रतिशत अनिवार्य रूप से खर्च किया जाए तथा (5) अलग-अलग तरह के सरकारी स्कूलों की व्यवस्था समाप्त कर संविधान के अनुरूप समान शिक्षा प्रणाली अविलम्ब लागू हो ताकि सुविधासम्पन्न और वंचित दोनों तबकों के बच्चों को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिल सके।
यह वक्त एकजुट होकर आवाज उठाने का है, चुप रहने का नहीं। आइये बदलाव के इस अभियान को मंजिल तक पहुँचाने के लिए इस व्यापक हस्ताक्षर अभियान में शामिल हों और दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र के लिए नीतियाँ बनाने वाले और उन्हें लागू करने वाले लोगों तक अपनी यह आवाज़ पहुंचाएं कि गैर बराबरी और असमानता का पिछले बासठ वर्षों का व्यवहार अब हमें मंजूर नहीं है और अब यहाँ की शिक्षा व्यवस्था में इस क्षेत्र की अपेक्षाओं के अनुसार आमूल परिवर्तन लाना ही होगा। इसके अलावा और इससे कम अब हमें कुछ नही चाहिए।
तो आइये इस मांग पत्र पर अपना हस्ताक्षर कर हम इस अभियान के साथ अपनी एक जुटता जाहिर करें।
समान बचपन जिन्दाबाद!