माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने एक निर्णय में "पदोन्नति में आरक्षण" को संविधान की मूल भावना के विपरीत बताया गया है । केंद्र सरकार एवं अन्य सत्तालोलुप व्यावसायिक दलों द्वारा संविधान में संशोधन कर इसे लागू करने का प्रयास किया जा रहा है । इस हेतु विगत सत्र में राज्य सभा में संविधान संशोधन विधेयक भी पेश कर दिया गया है किन्तु कोयला घोटाले पर हंगामे के कारण ये पास नहीं हो सका । इसे अनारक्षित वर्ग का सौभाग्य कहे या ईश्वरीय संकेत कि हमें फ़िलहाल शीतकालीन सत्र तक का समय मिल गया है ।
अब समय आ गया है उन सभी प्रबुद्ध नागरिकों के एकत्रित होने का, जो जाति आधारित कार्य व्यवस्था को देश हित में नही मानते जिससे माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिखाई गई इस रोशनी की किरण को बुझने न दिया जाए ।
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