बीते कुछ सालों लगभग (10-12) करसोग को अलग अलग रंग बदलते हुए देखा। मेरे माता पिता 1993 के लगभग यहाँ आये और यही के होकर रह गए ।मेरा जन्म भले ही मंडी में हुआ लेकिन दिल से मैं पूरी तरह से करसोग की पहारन हूँ ।इसीलिए शायद आज ये पोस्ट लिख पा रही हु । मैं बदलाव की बात कर रही थी के कैसे करसोग को बदलते हुए मैंने देखा ।अचम्भा होता है जब भी घर आती हूँ। पहले कुछ गिनी चुनी दुकाने थी बाज़ार शुरू होने से पहले ही ख़त्म हुआ सा लगता था । घरो की संख्या भी काफी कम थी । सड़के गड्डो वाली तब भी थी और आज भी हैं। कुछ चीज़े कभी नहीं बदलती और करसोग की मुख्य सड़क की हालत भी कुछ ऐसी ही है। कल माँ के साथ शिव मंदिर तक गयी तो मेरी नज़रे उन इमारतो की तरफ ही थी जो अभी बन रही है और जुबान पर यही आ रहा तह "लोगों के पास बहुत पैसा हो गया है कितने बड़े बड़े घर हैं " ।
आज करसोग बदला हुआ सा लगता है । स्नाराली से ही ढेर दुकाने और ढेर सारे बड़े बड़े घर दिखाई देते हैं ।
सबके पास गाड़िया भी है वो भी महंगी वाली लेकिन पता नहीं लोगो की नज़रे सड़क ओर जाती हैं या नहीं । शहर को मुख्या सड़क होते हुए भी इतनी खस्ता हालत है तो गाँव की सड़को को तो रहने ही दीजिये।
MLA साहब भी तो इसी सड़क से कई बार गुजरे होंगे पर उनको भी बड़ी बड़ी और ऊंची मंजिलो की चमक ने सड़क के अँधेरे का आभास भी नहीं होने दिया होगा ।ज़मीनी सच्चाईयों से सभी लोग मुहं फ़ेरते हुए या नकारते हुए नज़र आते हैं चाहे फिर आम इंसान हो या विधायक या कोई अधिकारी/कर्मचारी।
मन को बहुत ठेस पहुंचती है जब लगता है हम केवल अपने आप को ही देख रहे हैं। बस खुद तक सिमित हो जा रहे है ।अपना घर(बंगला)अपनी गाड़ी ,अपना पैसा ,बाकि दुनिया जाये भाड़ में । इसी को Development कह दिया जाएगा और इसी पे दम ठोका जाएगा ।।
क्या यही विकास है??अगर हाँ तो ऐसा ही करते रहिये । अगर ना तो जागिये और सोचिये के केसे विकास की सही परिभाषा बनाई जाये।।